जिग एवं फिक्श्चर लेखमाला के तहत पिछले 2 अंकों में (धातुकार्य : अक्तूबर और नवंबर 2019) हमने देखा कि होरिजोंटल और वर्टिकल मिलिंग मशीन पर फिक्श्चर किस तरह काम करता है। इस लेख में हम देखेंगे कि एक अलग ही तरह की युनिवर्सल मिलिंग मशीन पर फिक्श्चर कैसे काम करता है।
चित्र क्र. 1 में दिखाया गया पुर्जा ऐल्युमिनियम धातु का बनाया हुआ है। इसका वजन लगभग 10 किग्रै. है। इस पुर्जे की कार्यप्रक्रिया समझने के लिए चित्र क्र. 2 देखें।
1. पहले बोरिंग कर के 413 मिमी. का व्यास बनाया और उसी सेटिंग में फेस A का यंत्रण किया। इससे बोर एवं फेस एक दूसरे से लंबकोण में पाए गए। उसी तरह, फेस A के बाजू में रहे सभी Ø419 मिमी., Ø436 मिमी., Ø476 मिमी. और चैंफर का भी यंत्रण कर लिया। इस हेतु पुर्जा 457.8 मिमी. व्यास पर पकड़ा। मूल कास्टिंग में यह व्यास 462 मिमी. है।
2. अब 413 मिमी. व्यास के संदर्भ से, यानि कि उसमें लोकेट करते हुए और पुर्जा 510/530 इस फेस पर सटा कर दूसरी तरफ की पूरी प्रक्रिया खत्म की।
3. इसी 413 मिमी. व्यास में पुर्जा लोकेट कर के और 12 रिब में से एक रिब का कोणीय स्थान (ऐंग्यूलर लोकेशन) (ओरिएंटेशन) ले कर, 18 मिमी. व्यास के 12 छिद्र बना लिए।
4. आगे के सभी कार्य, 18 मिमी. व्यास वाले दो छिद्रों में, लोकेशन ले कर बनाए गए हैं जो चित्र क्र. 3 में लाल रंग से दर्शाए गए हैं।
हम ये सारे काम, 413 मिमी. व्यास में लोकेट कर के और 18 मिमी. व्यास के 1 छिद्र का प्रयोग करते हुए (ओरिएंटेशन) कर सकते हैं। परंतु ऐसा करने पर आने वाली आपत्तिजनक चीजें आगे दी गई हैं।
- अ. 413 मिमी. व्यास का बड़ा लोकेटर बनाना पड़ेगा, जिससे वजन और लागत दोनों बढ़ जाएंगे।
- आ. इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इन सभी फिक्श्चर में, 413 मिमी. व्यास पर बार बार पुर्जा लोकेट करने से वह व्यास खराब हो जाएगा, क्योंकि यह पुर्जा ऐल्युमिनियम जैसी नर्म धातु का है। चूंकि ऑटोमोबाइल क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पुर्जे ऐल्युमिनियम के बने होते हैं, उनका यंत्रण करते हुए यह मुद्दा हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।
- इ. यदि 413 मिमी. व्यास पर लोकेशन लें तो यह खांचा बनाना मुमकिन ही नहीं होगा।
अब हम देखेंगे कि ड खांचा कैसे बनाया जाए। चूंकि यह खांचा व्यास के अंदर है, सामान्य होरिजोंटल एवं वर्टिकल मिलिंग मशीन पर इसे बनाना मुमकिन नहीं था। यही इस विधि की समस्या थी। हमने इस समस्या को सुलझाने हेतु एक फिक्श्चर बनाया।
यह काम करने के लिए मशीन का हेड 413 मिमी. व्यास वाले छिद्र के अंदर लाना जरूरी था। यह सुविधा प्रदान करने वाली मशीन उपलब्ध थी। नहीं होती तो खास मिलिंग अटैचमेंट इस्तेमाल करना अनिवार्य था। इस पुर्जे के यंत्रण की प्रक्रिया चित्र क्र. 4 में दर्शाई गई है।
चित्र क्र. 5 में खांचा और कटर का बड़ा चित्र दिखाया है, जिससे आप समझ सकेंगे कि यंत्रण सचमुच किस तरह होता है।
खांचे की लंबाई (62 मिमी.) करने हेतु (X अक्ष) मशीन की बेड पर रहे स्टॉपर का प्रयोग किया। खांचे की गहराई के लिए (Z अक्ष) डायल पर रीडिंग सेट किया। खांचे के फेस से होने वाली दूरी के लिए 14 मिमी. (Y अक्ष) मशीन के स्टॉपर का इस्तेमाल किया।
चित्र क्र. 6 से हम जान सकते हैं कि फिक्श्चर में पुर्जा किस तरह पकड़ा गया है। दो क्लैंप की मदद से उसे कस कर पकड़ा जाता है। क्लैंप नट लोकेटिंग पिन पर कसा गया है। पिन को ही थ्रेडिंग किया है। पहला जरूरी काम यह किया कि खांचा द अक्ष से समानांतर बनाया। चित्र क्र. 3 में दर्शाए गए लाल रंग के छिद्रों में लोकेटिंग पिन लगा दी। परिशुद्ध नाप के लिए त्रिकोणमिति की सहायता लेनी पड़ेगी।
चित्र क्र. 7 में फिक्श्चर दर्शाया है। उसके विविध घटकों का कार्य अब हम देखेंगे।
1. बेस प्लेट : यह प्लेट पूरे फिक्श्चर का मूलाधार है। इस प्लेट पर, फिक्श्चर क्लैंपिंग के लिए ण आकार के खांचे दिए गए हैं। साथ ही, टेनन लगाने से खांचे का समानांतर यंत्रण होता है। इस फिक्श्चर की लंबाई ज्यादा होने के कारण, टेनन ना लगाए तो भी, पुर्जे पर रहा खांचा कुछ ज्यादा टेढ़ा नहीं होगा। क्योंकि खांचे की लंबाई केवल 62 मिमी. है और फिक्श्चर की लंबाई 850 मिमी. है।
2. पुर्जा सटाने की पट्टी (रेस्टिंग प्लेट) : ये दो खड़ी पट्टियां एक ही समतल (प्लेन) में बिठाई होती हैं। इन पट्टियों से पुर्जा सटता है और क्लैंप में पकड़ा जाता है। यह समतल टेनन खांचे से समानांतर होना जरूरी है।
3. आधार पट्टी (सपोर्ट प्लेट) : यह पट्टी पुर्जा सटाने की पट्टी को सहारा देने हेतु इस्तेमाल की गई है और वह स्क्रू एवं डॉवेल की मदद से लगाई गई है।
4. लोकेटिंग पिन : 18 मिमी. व्यास के दो छिद्रों में स्थान निर्धारण (लोकेशन) करने से खांचे के नाप में संगतता मिलती है। इस फिक्श्चर में लोकेटिंग पिन के दो कार्य हैं
अ. 18 मिमी. व्यास पर पुर्जा लोकेट होता है।
आ. पिन को ऊपर के हिस्से में थ्रेडिंग देने से पुर्जा क्लैंप कर सकते हैं।
5. क्लैंप : दो क्लैंप की मदद से पुर्जा कस कर पकड़ा जाता है, ताकि यंत्रण के दौरान वह हिले नही।
6. रिब : पुर्जा सटने की दो खड़ी पट्टियों को आधार देने का काम रिब करती हैं और उनकी मजबूती बढ़ाती हैं।
ऊपर बताया हुआ फिक्श्चर वेल्डिंग से भी बना सकते हैं। लेकिन वेल्डिंग के दौरान आने वाले अंदरी तनाव (इंटर्नल स्ट्रेस) से फिक्श्चर का आकार, कुछ समय बाद बिगड़ सकता है। तो पुर्जे की गुणवत्ता की कोई निश्चिति नहीं दे सकते। वेल्डिंग के दौरान आने वाला अंदरी तनाव हटाने के लिए स्ट्रेस रिलीविंग करना पड़ता है ताकि ऊपरलिखित दोष ना उभरे। परंतु यदि स्ट्रेस रिलीविंग ठीक से नहीं हुआ तो फिक्श्चर की परिशुद्धता खराब हो सकती है। इसलिए जिस फैक्टरी में स्ट्रेस रिलीविंग प्रक्रिया उपलब्ध नहीं होती, वहाँ वेल्डिंग से फिक्श्चर बनाना टालते हैं।
इस फिक्श्चर की संरचना एवं निर्माण पुणे स्थित निर्मल इंजीनीयरिंग के अविनाश देशपांडे (संपर्क : 9890622855) के सौजन्य से प्राप्त हुआ है। उन्होंने एक विख्यात सरकारी कंपनी के लिए यह फिक्श्चर बनाया है।
अगले लेख में हम ड्रिलिंग फिक्श्चर संबंधी जानकारी पाएंगे। इस प्रकार के फिक्श्चर का प्रयोग काफी ज्यादा मात्रा में किया जाता है और कई प्रकार के फिक्श्चर इस्तेमाल होते हैं। इसीलिए यह जानकारी पाना बहुत उपयोगी साबित होगा।
अजित देशपांडे
अतिथि प्राध्यापक, ARAI, SAE
9011018388
अजित देशपांडे जिग और फिक्श्चर के क्षेत्र में लगभग 36 सालों से ज्यादा अनुभव रखते हैं। आपने किर्लोस्कर, ग्रीव्ह्ज् लोम्बार्डिनी लि., टाटा मोटर्स जैसी विभिन्न कंपनियों में काम किया है। आप अभियांत्रिकी महाविद्यालयों में अतिथि प्राध्यापक हैं।