फाइनल अकाउंट्स से संबंधित अकाउंटिंग तत्व

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Dhatukarya - Udyam Prakashan    25-दिसंबर-2020   
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नवंबर 2020 की धातुकार्य पत्रिका में प्रकाशित लेख में हमने जाना कि व्यवसाय में लाभ एवं हानि के साथ, व्यवसाय की संपत्ति एवं देयक की कालानुरूप स्थिति निश्चित समय के अंतराल पर समझने के लिए हिसाब रखने हेतु एक आर्थिक वर्ष तय किया जाता है। इस हिसाब के आधार पर वर्ष के अंत में लाभ-हानि तथा बैलंस शीट ये दो महत्वपूर्ण विवरण बनाए जाते हैं।

हमारे देश में अधिकतम उद्योग तथा व्यवसायों का आर्थिक वर्ष हर साल 31 मार्च को समाप्त होता है। उस तारीख पर समाप्त हुए वर्ष के लिए लाभ-हानि लेखा (प्रॉफिट अैंड लॉस अकाउंट) और 31 मार्च की तारीख की बैलन्स शीट अर्थात वित्तीय स्थिति विवरण तैयार किए जाते है। इन दो विवरणों से 31 मार्च को समाप्त हुए वर्ष की आर्थिक स्थिति के बारे में पूरी जानकारी मिलती है। इसी लिए अंग्रेजी में इसका उल्लेख, फाइनल अकाउंटस्‌ इन समर्पक शब्दों में किया जाता है। ये दोनों महत्वपूर्ण आर्थिक विवरण समझ लेने से पहले इन्हें बनाते समय इस्तेमाल की गई अकाउंटिंग संकल्पनाएं जानना जरूरी है। इन्हें समझने से ही हम दोनों विवरणों में दिए गए आंकड़ो का अर्थ जान पाएंगे। इस भाग में हम इन संकल्पनाओं के बारे में जानेंगे।

अंतिम अकाउंटस्‌ से संबंधित लेखा विज्ञान के कुछ मूलभूत तत्व

1. व्यवसाय का अस्तित्व मालिक से अलग मानना
व्यवसाय का अस्तित्व व्यवसाय के मालिक से अलग मान कर हिसाब रखे जाते हैं। जैसे किसी प्रोपाइटरशिप में, कानून की दृष्टि से व्यवसाय भले ही मालिक का हो फिर भी हिसाब रखने हेतु मालिक को व्यवसाय से अलग समझा जाता है। उसने कारोबार में निवेश की गई पूंजी को कारोबार को मिला ऋण माना जाता है। उसी प्रकार समय समय पर मालिक द्वारा व्यवसाय से उठाए गए पैसों को, व्यवसाय से लिए गए अैडवान्स के तौर पर दर्ज किया जाता है। व्यवसाय के हिसाब उसके मालिक की नहीं बल्कि व्यवसाय की दृष्टि से रखे जाते हैं। मालिक से व्यवसाय को अलग समझना यह तत्व हिसाब का एक महत्वपूर्ण भाग है। इस तत्व के आधार पर मालिक की निजि संपत्ति और देयक व्यवसाय के हिसाब में नही ली जाती, इसलिए किसी उद्यम की बैलन्स शीट में जो संपत्ति तथा देयक दर्शाए जाते हैं, सभी उस उद्यम के ही होते हैं। इसमें मालिक की निजि संपत्ति का समावेश नहीं किया जाता। व्यवसाय में मालिक ने निवेश की पूंजी, मालिक की दृष्टि से उसकी अपनी संपत्ति होती है। लेकिन उल्टी दिशा में यानि व्यवसाय की दृष्टि में वह व्यवसाय की लाएबिलिटी अथवा देयता होती है। इसी लिए बैलन्स शीट में मालिक की पूंजी लाएबिलिटी अर्थात देयक बाजू में, व्यवसाय के अन्य देयकों की तरह दर्शाई जाती है।

2. व्यवसाय का स्थायी अस्तित्व मानना
जिस उद्योग के हिसाब रखने हैं, उसके खातों को इस धारणा पर रखा जाता है कि व्यवसाय स्थायी स्थिति में चलता रहेगा। इस संकल्पना से दीर्घावधी लाभ देने वाले खर्चे, जैसे मशीन की खरीदारी आदि, एक ही साल में एकसाथ खर्चे के रूप में नहीं दिखाए जाते बल्कि संपत्ति के रुप में दर्ज किए जाते हैं। हर आर्थिक वर्ष में मशीन के इस्तेमाल के खर्चे के लिए विमूल्यन (डेप्रिसिएशन) की रकम, मुनाफे से घटाई जाती है।
इसी लिए अकाउंटिंग करते समय संपत्ति और देयक का वर्गीकरण करते वक्त, एक साल से कम अवधि की मालमत्ता और देयक चालू (करंट) इस शीर्षक के अंतर्गत लिए जाते हैं। जैसे, दैनिक खर्चे के लिए जरूरी नकद, कच्चा माल, उत्पादन प्रक्रिया में अपूर्ण माल, तैयार माल, उधारी पर वस्तुएं बेचने पर ग्राहकों से वसूले जाने वाले बिल की राशि, आपूर्तिकर्ताओं (सप्लाइअर) के देय बिल आदि। कारोबार में जो संपत्ति तथा देयक इससे अधिक समय तक रहने की संभावना होती है, उन्हें स्थिर संपत्ति और दीर्घ अवधि के देयक के शीर्षक के अंतर्गत हिसाब में रखा जाता है। मिसाल के तौर पर जमीन, इमारत, मशीनरी, पेटंट, टर्म लोन आदि।

3. दोहरे परिणाम के तत्व
समस्त विश्व में उद्योग के हिसाब, आम तौर पर डबल एंट्री बुक कीपिंग के तत्वों के अनुसार रखे जाते हैं। इस तत्व के अनुसार किसी भी व्यवहार की प्रविष्टि हिसाब में करते समय माना जाता है कि उस व्यवहार से कम से कम दो अकाउंटिंग परिणाम होने वाले हैं और उसी तरीके से हिसाब रखा जाता है। मिसाल के तौर पर, हमने देखा था कि मालिक ने दस हजार रूपए नकद से कारोबार शुरू किया। इसे हिसाब में नकद संपत्ति के रुप में दर्ज किया जाता है, लेकिन उतनी ही रकम मालिक के प्रति कर्ज के तौर पर दर्ज की जाती है। दोहरे परिणामों के इस तत्व के अनुसार, किसी भी आर्थिक व्यवहार के जो दो या उससे अधिक अकाउंटिंग परिणाम होते हैं उनमें से कुछ डेबिट तथा कुछ क्रेडिट रुप में होते हैं। किसी व्यवहार में अगर दो ही अकाउंटिंग परिणाम मुमकिन होंगे अर्थात उस व्यवहार का संबंध सिर्फ दो अकाउंट से आता होगा, तो उसमें से एक खाते पर उस व्यवहार की रकम डेबिट की जाती है तथा दूसरे बचे खाते में उतनी ही रकम क्रेडिट की जाती है। हर व्यवहार के लिए हिसाब में डबल एंट्री पद्धति से प्रविष्टि की जाती है, उसमें से डेबिट एवं क्रेडिट परिणामों का योग हमेशा एकसमान होता है। हर व्यवहार को दर्ज करते समय डेबिट एवं क्रेडिट बाजू के परिणाम समान रकम से दर्ज किए जाते हैं। इसलिए साल के अंत में जब बैलन्स शीट बनाने के लिए हिसाब की किताबों का सर्वेक्षण किया जाता है तब भी पूरे वर्ष में किए गए सारे आर्थिक व्यवहार की प्रविष्टि में डेबिट एवं क्रेडिट परिणामों का कुल योग समान होता है। इसी लिए व्यवसाय की कुल संपत्ति और देयक समान रकम के दिखाई देते हैं। हमने पहले देखा है कि हिसाब दर्ज करने के लिए व्यवसाय का अस्तित्व मालिक से अलग माना जाता है। लेकिन उसी समय व्यवसाय के पास खुद का कुछ नहीं होता, इस तत्व का भी पालन किया जाता है। इसलिए व्यवसाय में जो संपत्ति होती है उसे प्राप्त करने के लिए व्यवसाय को मालिक तथा अन्य लोगों से उतना ही कर्ज तैयार होता है। इसका मतलब व्यवसाय में जितनी संपत्ति उतना ही उसका देयक यह बैलन्स या तालमेल हमेशा बना रहता है और इसी को बैलन्स शीट कहते है।
व्यवसाय की संपत्ति तथा देयक की तरफ, व्यवसाय का हिसाब रखने वाले की दृष्टि तटस्थ होती है। साथ ही, हिसाब लिखते समय व्यवसाय का अपना कुछ नहीं होता यह समझ कर वह अपना काम करता है। अर्थात 'इदम न मम' इस अध्यात्मिक तत्व का पालन किया जाता है। बैलन्स शीट इस नाम में ही बैलन्स यानि संतुलन अपेक्षित है और हिसाब रखते समय दर्ज किए हर व्यवहार के डेबिट और क्रेडिट समान होने पर ही ये बैलन्स हासिल कर सकते हैं।

4. आमदनी और खर्चे का समन्वय रखना
व्यवसाय से प्राप्त आमदनी और उसे पाने हेतु किया गया खर्चा, इनके हिसाब में तालमेल है या नहीं ये हमेशा जांचा जाता है। प्राप्ति और खर्चे में से कुछ भी,
लाभ-हानि विवरण में दिखाने से पहले उन्हें एक दूसरे से संबद्ध किया जाता है और उनमें से कोई परस्पर तुलना में अपूर्ण तो नहीं है यह जांचा जाता है। उदाहरण के लिए अगर कोई व्यापारी विशेष ऑर्डर पूरी करने हेतु एक लाख रूपए का माल खरीदता है, लेकिन आर्थिक वर्ष पूरा होने से पहले वह माल बेचा नहीं गया तो इस तरह बचा माल, उस साल के खर्चे में ना दिखा कर उसे बैलन्स शीट में शेष माल (स्टॉक) के रूप में दिखाया जाता है। जिस साल में उसे बेचा जाएगा उसी साल में उसे खर्चे के तहत लिखा जाएगा।
हम एक और मिसाल देखते हैं। कभी कभी आपूर्तिकर्ता से आए मटीरीयल के इस्तेमाल से तैयार हुए माल की बिक्री भी हो जाती है, लेकिन कार्यालयीन विलंब के कारण आपूर्तिकर्ता से साल के अंत तक उस माल का बिल नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में हिसाब में सिर्फ बिक्री की प्रविष्टि की गई, उसे बेचने के लिए जिस माल को खरीदा जाता है उसे खर्चा मान कर हिसाब में नहीं लिया गया, तो इस साल की बिक्री की सारी रकम लाभ के तौर पर इस साल के लाभ-हानि विवरण में दिखेगी। इसलिए अगले साल जब बिल मिलेगा तब उस साल के लाभ-हानि विवरण में सिर्फ खर्चे की प्रविष्टि दिखाई देगी। अर्थात पहले साल का लाभ तथा दूसरे साल की हानि, दोनों भी गलत दिखाए जाएंगे। क्योंकि इस साल की बिक्री की प्राप्ति का, संबधि खरीद के खर्चे से समन्वय नहीं किया गया। यह समन्वय करने के लिए, आपूर्तिकर्ता से बिल न मिलने फिर भी, हम पर्चेस ऑर्डर के आधार पर उस माल का मूल्यांकन कर के वह रकम खर्चे के स्तंभ में दर्ज कर सकते हैं। अर्थात आमदनी पाने हेतु किया गया खर्चा भी हिसाब में दर्ज होगा और दर्शाई गई लाभ की स्थिति यथार्थ होगी।
प्राप्ति और खर्चे के समन्वय के इस तत्व को मैचिंग प्रिन्सिपल कहा जाता है। इस तत्व के पालन से किसी भी आर्थिक वर्ष के लाभ-हानि विवरण में दिखने वाला लाभ, उस साल में हुए आर्थिक व्यवहारों का संपूर्ण परिपाक होने का भरोसा होता है। इस तत्व का पालन ना करें तो एक आर्थिक वर्ष में प्राप्ति की प्रविष्टि और अगले आर्थिक वर्ष में सिर्फ खर्चे की प्रविष्टि हो कर, दोनों साल के लाभ या हानि अवास्तविक होंगे। मैचिंग द्वारा इस बात को टाला जाता है।

5. नीति निरंतरता
हर जगह हिसाब में दर्ज किए जाने वाले कई तत्व, संकल्पना और नियम समान होते हैं लेकिन इनमें से कुछ पर अमल करते समय लेखा विज्ञान में विभिन्न विकल्प चुनना मान्य होता है। इसलिए ऐसे वैकल्पिक नीति के तत्व और संकल्पना के संदर्भ में उद्योग जिन विशेष विकल्प को चुनते है, उन्हे निरंतर हर आर्थिक वर्ष के हिसाब में लिखे जाने की अपेक्षा होती है। ऐसा ना करने पर, हर आर्थिक वर्ष के हिसाब के अनुसार दिखने वाले परिणामों की उचित तुलना नहीं कर सकते। अर्थात नीति निरंतरता का मतलब यह नहीं है कि एक बार चुने गए विकल्प कभी न बदले जाए। स्थिति के अनुसार किसी आर्थिक वर्ष में अगर अकाउंटिंग पॉलिसी में बदलाव करने हो, तो आर्थिक प्रतिवेदन में ऐसे बदलाव के बारे में स्पष्ट सूचना देना जरूरी है।
जैसे कि, उद्योगों को शेष बचे माल यानि स्टॉक का मूल्यांकन करते समय फिफो (फर्स्ट इन फर्स्ट आउट), लिफो (लास्ट इन फर्स्ट आउट) या वेटेड अैवरेज जैसे विकल्प अपनाने की स्वतंत्रता होती है, लेकिन एक वर्ष में एक विशेष पद्धति से मूल्यांकन करने के बाद अगले साल के बचे स्टॉक का मूल्यांकन उसी प्रकार से करना जरूरी है। ऐसा ना करने पर लाभ या हानि की यथार्थ स्थिति नहीं दिखाई जाएगी। फिर भी किसी वर्ष में किसी कारणवश मूल्यांकन की पद्धति बदलने की जरूरत हो तब उसे बदला जा सकता है। ऐसे बदलाव से लाभ या हानि पर कितना असर पड़ा है, यह बात फाइनल अकाउंटस्‌ में टिप्पणी के रूप में लिखनी होती है।

6. कॉन्जर्वेटिजम
हिसाब रखते समय कॉन्जर्वेटिजम संकल्पना का अनुसरण करने का एक महत्वपूर्ण तत्व लेखा विज्ञान में है। इसका मतलब है, प्राप्त आमदनी दर्ज करने से पहले वह यकीनन प्राप्त हुई है या नहीं इसकी पुष्टि की जाती है। साथ में किसी नुकसान या खर्चे की आशंका होने पर वे वास्तव में हो या ना हो, उन्हें दर्ज किया जाता है। ऐसा करने का उद्देश्य होता है, हिसाब में दर्शाई आर्थिक स्थिति वास्तव में होगी यह देखना। इसलिए हिसाब रखने वाले, व्यवसाय की आर्थिक स्थिति बढ़ा-चढ़ा कर बताने के बजाय जो वास्तव में है उसे दिखाने का प्रयास करते हैं। इसके पिछे बढ़ा-चढा कर स्थिति बता कर दिशाभूल करने के बजाय कठोर ही सही, वास्तविकता दर्शाने का दृष्टिकोन होता है। मिसाल के तौर पर देखें तो आर्थिक वर्ष के अंत में जो माल शेष रहता है, लाभ-हानि विवरण के लिए उसकी कीमत खरीद कीमत या बाजार मूल्य के अनुसार दोनों में से जो कम हो उसके आधार पर इस शेष माल का मूल्यांकन किया जाता है। 'कॉस्ट अैंड मार्केट प्राइज विचएवर इज लोअर' इस तत्व के अनुसार शेष माल की बाजार में कीमत अगर खरीद की कीमत से अधिक होती है तब इस बढ़ी कीमत से होने वाले लाभ पर विचार नहीं किया जाता। लेकिन जब बाजार की कीमतें गिर जाती हैं तब वास्तव में माल की बिक्री न हुई हो फिर भी शेष बचे माल की बिक्री से होने वाले नुकसान का बाजार भाव के अनुसार माल का मूल्यांकन कर के हिसाब में लिया जाता है।

7. समस्त महत्वपूर्ण आर्थिक घटनाओं की प्रविष्टि करना (मटीरियालिटी)
व्यवसाय की आर्थिक स्थिति पर परिणाम करने वाली सभी घटनाएं हिसाब में दर्ज की जाने की पुष्टि, फाइनल अकाउंटस्‌ बनाने से पहले हमेशा की जाती है। विशेष आर्थिक घटना हिसाब में दर्ज करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है या नहीं, इसका निर्णय स्थिति के अनुसार लेना पड़ता है। कारोबार की कुल बिक्री की तुलना में नजर आए किसी व्यवहार की रकम यह इसमें मुख्य निकष होता है, फिर भी वह एकमात्र निकष नहीं होता। जैसे कि, किसी कंपनी का टर्नओवर 500 करोड़ हो और उसके हिसाब में 1000 रुपए का बिल दर्ज किए बिना बचा हो, तो ऐसी मामूली रकम वाली अन्य भी छोटी गलतियों का ज्यादा असर कंपनी के फाइनल रिपोर्ट में दर्शाए लाभ या हानि की विश्वसनीयता पर नहीं पड़ता। लेकिन दर्ज न की हुई 1000 रुपए की बिक्री, कंपनी के किसी नए उत्पाद की उस साल की पहली बार हुई कुल बिक्रि हो, तो यह बिल हिसाब में न लेने की गलती को फाइनल अकाउंटस्‌ में महत्वपूर्ण जानकारी छुपाने के उद्देश्य से की गई गलती मानी जा सकती है। इस प्रकार के फाइनल अकाउंटस्‌ कंपनी के उस वर्ष की आर्थिक स्थिति सही नहीं दर्शाते, ऐसा भी निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
उपरोक्त तत्वों के आधार पर हिसाब रखे जाते हैं और इन हिसाब के संक्षिप्त ब्योरे (समरी) के रुप में वर्ष के अंत में फाइनल अकाउंटस्‌ तैयार किए जाते हैं। अगले लेख में हम फाइनल अकाउंटस्‌ तैयार करने के बारे में और उन्हें किस प्रकार समझा जाता हैं इस पर चर्चा करेंगे।



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मुकुंद अभ्यंकर चार्टर्ड अकाउंटंट हैं। आप पिछले 30 वर्षों से अनेक कंपनियों के लिए लेखा परीक्षण तथा आर्थिक घटनाओं के विश्लेषण का कार्य कर रहें हैं।
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