संपादकीय

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Dhatukarya - Udyam Prakashan    21-सितंबर-2021   
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अंग्रेजी में एक कथन है, ‘The only thing constant in the world is CHANGE’, यानि निरंतर परिवर्तन ही प्रकृति का स्थायी नियम है। आसपास की दुनिया तेजी से बदल रही है। खास कर के, कोविड फैलने के बाद यह मुद्दा अधिक स्पष्टता से दिखाई पड़ा है। रोजमर्रा के व्यवहारों में बड़े परिवर्तन हुए, शिक्षा की पद्धतियां बदल गई, उद्योग एवं व्यवसायों की जरूरतों तथा मानकों में बदलाव हो गए। इससे एक मुद्दा फिर से अधोरेखांकित हुआ, कि परिवर्तन स्वीकारना तथा उन पर अमल करना अनिवार्य है।
 
हाल ही में संपन्न हुए ऑलिंपिक खेल हम सभी ने देखे और उनका आनंद भी लिया। इन खेलों में शामिल कुल राष्ट्रों में से 86 राष्ट्रों ने कम से कम एक तो पदक हासिल किया। इनमें, दुनिया के सबसे अमीर देशों के साथ, वित्तीय हालात गंभीर होने वाले गरीब देश भी हैं। इन 86 देशों में भारत 48 वे स्थान पर है। आबादी के संदर्भ में दुनिया में दूसरे स्थान पर तथा कुल वित्तव्यवस्था के संदर्भ में पांच अग्रणी देशों में से एक होने वाले अपने देश में, बड़ी संख्या में पदक-विजेता क्यों नहीं हैं इस पर बहस की गई और अब तक के सबसे अधिक यानि 7 पदक पाने का आनंद भी व्यक्त किया गया। पदक विजेता राष्ट्रों की सूचि में पहले 10 स्थानों पर होने वाले राष्ट्रों में एक साझा मुद्दा है। ये सभी देश औद्योगिक दृष्टि से प्रगत हैं, फिर वे आकार में या जनसंख्या में भिन्न स्तर पर क्यों ना हो। उनके नागरिकों का जीवन स्तर उच्च है, उनके उद्यम अत्याधुनिक हैं जिनमें नवीन तकनीक अपना कर दर्जेदार निर्माण किया जाता है। शायद यही विचारधारा का प्रयोग खेल के क्षेत्र में करने के कारण, उन्होंने जीते पदकों की संख्या भी अधिक है। नवीन तकनीक, निरंतर श्रम तथा योग्य प्रशिक्षण के आधार पर उनके खिलाड़ी सर्वोच्च स्थान तक पहुंचते हैं।
 
अपने लघु एवं मध्यम उद्योग क्षेत्र के संदर्भ में कहा जाए तो शॉप फ्लोर पर नवीन तकनीक, कार्यक्षमता और वैयक्तिक प्रशिक्षा इन 3 घटकों में निवेश करने से ही हम टिके रह सकते हैं तथा तरक्की कर सकते हैं। नई तकनीक पर अमल करने का निर्णय, कई बार, वित्तीय क्षमता पर निर्भर करता है लेकिन कार्यक्षमता और प्रशिक्षा का सीधा संबंध, कारखाने की कार्यसंस्कृति से है। कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए भी प्रशिक्षा आवश्यक होती है। यहाँ प्रशिक्षा का मतलब केवल पाठशाला में बैठ कर सीखने जितना सीमित नहीं है बल्कि उपलब्ध वेबसाइट एवं यू-ट्यूब चैनल तथा तकनीकी पत्रिकाओं जैसे माध्यमों का उपयोग करना भी इसमें शामिल है। कुछ कारखानों में, इस दृष्टि से सोच-समझ कर प्रयास किए जाते हैं। विविध कार्यसमूहों द्वारा कारखाने की समस्याओं का समाधान करने, प्रक्रिया सुधारने तथा कुल कार्यक्षमता बढ़ाने हेतु नवीन पद्धतियों और तकनीकों के लिए वे आग्रही रहते हैं।
 
कारखाने में काम करने वाले हर व्यक्ति ने खुद को प्रशिक्षित तथा उन्नत बनाना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से ‘धातुकार्य’ में हर महीना, तकनीकी जानकारी देने वाले लेख प्रकाशित किए जाते हैं। इस अंक के अधिकांश लेख, फॉर्म एवं प्रोफाइल यंत्रण की जानकारी देने वाले हैं। विविध सटीक पैरामीटर वाले पुर्जों के मापन हेतु विकसित मशीन की जानकारी आप ‘मापन’ विभाग में पढ़ेंगे। फॉर्म अथवा प्रोफाइल का यंत्रण करते वक्त विशिष्ट ज्यामिति के टूल का उपयोग करना होता है, जिसका तकनीकी विवरण देने वाले लेख ‘टूलिंग’ विभाग में शामिल किए हैं। प्रोग्रैमिंग की प्रक्रिया सुलभ बनाने वाला मैक्रो प्रोग्रैमिंग तथा उसके उपयोग से संबंधित जानकारी भी इस अंक में दी गई है, जो पाठकों को यकीनन उपयुक्त रहेगी। साथ ही वित्तीय नियोजन, सी.एम.एम. कथा, प्रोग्रैमिंग आदि लेखमालाएं भी, शॉप फ्लोर पर किए जाने वाले आपके रोजमर्रा के कामों में सहायक होगी, यह हमें विश्वास है।

दीपक देवधर
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